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वो भी क्या दिन थे कि जब उस का मिरा याराना था | शाही शायरी
wo bhi kya din the ki jab us ka mera yarana tha

ग़ज़ल

वो भी क्या दिन थे कि जब उस का मिरा याराना था

बिस्मिल सईदी

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वो भी क्या दिन थे कि जब उस का मिरा याराना था
आप से बेगाना वो था ख़ुद से मैं बेगाना था

रब्त-ओ-ज़ब्त-ए-बाहमी के हाए वो राज़-ओ-नियाज़
आशिक़ाना हुस्न था और इश्क़ मअशूक़ाना था

मैं अगर गुल था तो वो था बुलबुल-ए-शैदा मिरा
और अगर वो शम्अ' था तो इस का मैं परवाना था

वो कभी दीवाना था मेरे लिए लैला कभी
मैं कभी उस के लिए लैला कभी दीवाना था

उस को था दीदार हासिल मुझ को नज़्ज़ारा नसीब
मेरे उस के दरमियाँ इक जल्वा-ए-जानाना था

मेरे कुफ़्र-ए-इश्क़ में थी एक ईमानी अदा
उस के काफ़िर हुस्न में इक इश्वा-ए-तुरकाना था

साजिद-ओ-मस्जूद हम बाहम थे हम दोनों का दिल
का'बे का का'बा था और बुत-ख़ाने का बुत-ख़ाना था

मेरे अश्क-ए-शौक़-ए-पैहम में थी उस की दास्ताँ
उस के अंदाज़-ए-तबस्सुम में मिरा अफ़्साना था

झूम भी उट्ठी उधर कैफ़-ए-तरब से रूह-ए-नाज़
और इधर होंटों ही पर मेरे अभी पैमाना था

हाए वो शहबा-ए-ज़ुल्फ़-ओ-काकुल-ओ-गेसू कि जब
आफ़्ताब-ए-सुब्ह भी इक शम-ए-इशरत-ख़ाना था

शामिल-ए-अन्फ़ास थे नग़्मात-ए-ऐश-ओ-इंबिसात
ज़िंदगी के साज़ का हर ज़ेर-ओ-बम शाहाना था

आँख से दिल में समा जाते थे दिल से रूह में
ज़िंदगी-ए-शौक़ का हर हाल बेताबाना था

हाए वो मय-ख़्वारी-ए-बाहम का आलम आह जब
एहतिमाम-ए-मय बग़ैर-ए-शीशा-ओ-पैमाना था

जब मिलीं आँखों से आँखें जब मिले होंटों से होंट
हर नज़र पैमाना थी और हर-नफ़स मय-ख़ाना था

उफ़ वो रब्त-ओ-ज़ब्त शर्म-ओ-शौक़ जब बा-हम-दिगर
एक जज़्बा मुश्तरक था और बेबाकाना था

वो तक़द्दुम शर्म का हो या तजावुज़ शौक़ का
दाख़िल-ए-मुस्तसनियात-ए-लग़्ज़िश-ए-मस्ताना था

उफ़ वो फ़र्त-ए-शौक़ जिस का नाम था रंजीदगी
आलम-ए-रंजीदगी किस दर्जा महबूबाना था

बरहमी पर हाए वो जुर्माना-हा-ए-जुर्म-ए-शौक़
वज्ह-ए-अफ़्ज़ूनी-ए-शौक़-ए-जुर्म हर जुर्माना था

हो रहे थे यूँ बसर रोज़-ओ-शब उम्र‌‌‌-ए-नशात
मेहर-ओ-मह से एहतिमाम-ए-ज़ीनत-ए-काशाना था

बे-तअल्लुक़ ज़िंदगी होने का था इम्काँ ही क्या
ज़िंदगी ज़ुल्फ़-ए-तअ'ल्लुक़ थी मुक़द्दर शाना था

रूनुमा लेकिन मुक़द्दर से हुआ वो इश्क़ के
जो तलव्वुन हुस्न की फ़ितरत में महबूबाना था

हुस्न तो है इक तजल्ली शम-ए-हर-महफ़िल-सिफ़त
वो तो कह देगा ये इक अंदाज़-ए-माशूक़ाना था

हाँ मगर कल इश्क़ को देखा कि वो शोरीदा-बख़्त
बढ़ चुका था ज़िंदगी में मौत से दीवाना था

जा रहा था बे-इरादा बे-ख़याल-ए-सम्त-ओ-राह
और ज़बाँ पर नाला-ए-मौज़ूँ ये मज़लूमाना था

चश्म है महरूम-ए-सूरत गोश मायूस-ए-सदा
ख़्वाब था जो कुछ कि देखा जो सुना अफ़्साना था