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वो आलमगीर जल्वा और हुस्न-ए-मुश्तरक तेरा | शाही शायरी
wo aalamgir jalwa aur husn-e-mustarak tera

ग़ज़ल

वो आलमगीर जल्वा और हुस्न-ए-मुश्तरक तेरा

शाद अज़ीमाबादी

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वो आलमगीर जल्वा और हुस्न-ए-मुश्तरक तेरा
ख़ुदा जाने इन आँखों को हुआ किस किस पे शक तेरा

बता हद से सिवा हम पाँव फैलाएँ किधर जाएँ
फ़क़त दो गज़ ज़मीं अपनी है और सातों फ़लक तेरा

किया ऐ सोने वाले रहम सुब्ह-ए-वस्ल ने तुझ पर
कि जूँ जूँ खुलती हैं आँखें मिटा जाता है शक तेरा

बस अब हद है कि ग़ैरों तक का दामन जा के पकड़ा है
डिगे किस किस जगह हम हो गया किस किस पे शक तेरा

तिरे नक़्श-ए-क़दम की गर्द तक पहुँचे न वामाँदा
बहुत पीछा किया ऐ कारवाँ कोसों तलक तेरा

ग़िज़ा-ए-रूह है ऐ हुस्न तू अपनी मलाहत से
हर इक के ज़ाइक़े में ठीक है आब-ओ-नमक तेरा

अगर आँखें सलामत हैं तो क्या क्या कुछ दिखाएगा
यही फैला हुआ जल्वा समा से ता-समक तेरा

मिरी हम-दर्दियों से हो गई ग़ैरों को इक इबरत
लिया घबरा के जब जब नाम-ए-नामी बे-धड़क तेरा

न पूछो इश्क़ ने ग़ैरत से क्या क्या रंग बदला है
ख़याल आया है साथ औरों के जब जब मुश्तरक तेरा

फ़क़त ज़ाहिद पे क्या मौक़ूफ़ सब की राल टपकी है
वो शोख़ी वो नुमू के दिन वो चेहरा बे-डलक तेरा

बहुत तू ने जब अपने पाँव फैलाए तो क्या चारा
अदब करती रही ऐ अश्क मुद्दत तक पलक तेरा

अबस उलझा के रक्खा है कोई इंसाफ़ भी आख़िर
उमीदें साथ देंगी 'शाद' आख़िर कब तलक तेरा