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वस्ल का ऐश कहाँ पर ग़म-ए-हिज्राँ तो है | शाही शायरी
wasl ka aish kahan par gham-e-hijran to hai

ग़ज़ल

वस्ल का ऐश कहाँ पर ग़म-ए-हिज्राँ तो है

मीर हसन

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वस्ल का ऐश कहाँ पर ग़म-ए-हिज्राँ तो है
लब-ए-ख़ंदाँ तो नहीं दीदा-ए-गिर्यां तो है

आरज़ू और तो कुछ हम को नहीं दुनिया में
हाँ मगर एक तिरे मिलने का अरमाँ तो है

हाल क्या पूछे है हैरत-कदा-ए-दहर का देख
आइना याँ का हर इक दीदा-ए-हैराँ तो है

दाम से ख़त के छुटा दिल तो नहीं ख़ातिर जम्अ
क़ैद करने को अभी ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ तो है

ले चला दिल को जो वो शोख़ तू हमदम न बुला
आफी आवेगा वो हम पास अभी जाँ तो है

गो न हो ऐश का अस्बाब मयस्सर तो न हो
वास्ते दिल के ग़म-ओ-दर्द का सामाँ तो है

एक ही दम में किया सर को जुदा ख़ूब किया
तेग़ का तेरी ये सर पर मिरे एहसाँ तो है

गो हुए जैब के टुकड़े तो नहीं ग़म हम को
चाक करने को हमारा अभी दामाँ तो है

जो पड़े इश्क़ की आफ़त में वही जाने 'हसन'
ख़ल्क़ के कहने में यूँ आशिक़ी आसाँ तो है