वस्ल भी होगा 'हसन' तू टुक तो इस्तिक़्लाल कर
हाल अपना हम से कह कह हम को मत बेहाल कर
सारबाँ गर्म-ए-हुदी है और जरस है नारा-ज़न
तू भी टुक महमिल के आगे गर्द-ए-मजनूँ हाल कर
शम्अ साँ जितना सुनाया हाल रो रो उस को मैं
उठ गया आख़िर वो सब बातें हँसी में टाल कर
मश्क़-ए-जाैर-ओ-ज़ुल्म तो करता ही जाता है वो शोख़
तू भी दिल सब्र-ओ-तहम्मुल का अब इस्तीमाल कर
ऐश-ओ-इशरत को न दे तू राह दिल में ऐ 'हसन'
दर्द-ओ-ग़म ही से किसी के इस को माला-माल कर
ग़ज़ल
वस्ल भी होगा 'हसन' तू टुक तो इस्तिक़्लाल कर
मीर हसन

