वक़्त-ए-सफ़र जो साथ चले थे
लगता था वो लोग भले थे
काँटों की तासीर लिए क्यूँ
फूलों जैसे लोग मिले थे
औरों के घर रौशन करने
सारी सारी रात जले थे
प्यास बुझाना खेल नहीं था
यूँ तो दरिया पाँव तले थे
शाम हुई तो सूरज सोचे
सारा दिन बे-कार जले थे
ग़ज़ल
वक़्त-ए-सफ़र जो साथ चले थे
प्रेम भण्डारी

