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वहशत-ज़दा दिल तो जूँ शरर है | शाही शायरी
wahshat-zada dil to jun sharar hai

ग़ज़ल

वहशत-ज़दा दिल तो जूँ शरर है

मीर असर

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वहशत-ज़दा दिल तो जूँ शरर है
इस के तईं आप से सफ़र है

तुम जौर-ओ-जफ़ा करो जो चाहो
इन बातों पे कब मुझे नज़र है

तू आप ही ख़ैर आप शर है
कुछ और न नफ़अ ने ज़रर है

हम बे-ख़बरों से रह ख़बर-दार
इतनी तो भला तुझे ख़बर है

गुज़री जाती है हर तरह से
दुनिया गुज़रान सर-ब-सर है

दिल के ख़तरों से बे-ख़तर हूँ
सर से पाँव तलक ख़तर है

तू ने ही तो यूँ निडर किया है
बस एक मुझे तिरा ही डर है

यूँ दर्द ब-जान-ओ-दिल समाया
हर नाला-ओ-आह कारगर है

या हज़रत-ए-अंदलीब बख़्शिश
ये तेरे ही दर्द का असर है

दिल तेरी तरफ़ है नित पर इस को
मालूम नहीं कि तू किधर है

यूँ आँख से आँख में मिला है
इतना तो मिरा दिल ओ जिगर है

बे-दर्द तू क्यूँकि रह सकेगा
ये हज़रत-ए-'दर्द' का 'असर' है