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वहशत में दिल कितना कुशादा करना पड़ता है | शाही शायरी
wahshat mein dil kitna kushada karna paDta hai

ग़ज़ल

वहशत में दिल कितना कुशादा करना पड़ता है

ऐनुद्दीन आज़िम

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वहशत में दिल कितना कुशादा करना पड़ता है
इन गीली आँखों को सहरा करना पड़ता है

मुझ को इक आवाज़ तिरी सुनने की कोशिश में
कितने सन्नाटों का पीछा करना पड़ता है

तब खुलती है हम पर क़द्र-ओ-क़ीमत फूलों की
जब काँटों के साथ गुज़ारा करना पड़ता है

यार बड़ा बन कर रहना आसान नहीं होता
अपने आप को कितना छोटा करना पड़ता है

कोह-ए-गिराँ हाइल होता है जिस के रस्ते में
इक दिन उस को तेज़ धमाका करना पड़ता है

अपने घर की बातें 'आज़िम' घर तक रखने में
दीवार-ओ-दर से समझौता करना पड़ता है