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वहशत-ए-जाँ को पयाम-ए-निगह-ए-नाज़ तो दो | शाही शायरी
wahshat-e-jaan ko payam-e-nigah-e-naz to do

ग़ज़ल

वहशत-ए-जाँ को पयाम-ए-निगह-ए-नाज़ तो दो

हसन नईम

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वहशत-ए-जाँ को पयाम-ए-निगह-ए-नाज़ तो दो
इस फ़साने को ज़रा गर्मी-ए-आग़ाज़ तो दो

मेरे क़दमों के निशाँ राह से कुछ दूर सही
तुम से मैं दूर नहीं हूँ मुझे आवाज़ तो दो

दिल में तूफ़ान नहीं हो तो करे क्या नग़्मा
मैं सुनाता हूँ यही राग मुझे साज़ तो दो

कोई बुनियाद नहीं क़ैद-ए-तअ'ल्लुक़ की अभी
जज़्बा-ए-ग़म को ज़रा फ़िक्र का अंदाज़ तो दो

उस ने सीने से लगाया जो कहा मैं ने 'हसन'
दिल में रखने के लिए अपना कोई राज़ तो दो