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वही मैं हूँ वही ख़ाली मकाँ है | शाही शायरी
wahi main hun wahi Khaali makan hai

ग़ज़ल

वही मैं हूँ वही ख़ाली मकाँ है

फ़ारूक़ नाज़की

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वही मैं हूँ वही ख़ाली मकाँ है
मिरे कमरे में पूरा आसमाँ है

दयार-ए-ख़्वाब ओ चश्म-ए-दिल-फ़िगाराँ
जज़ीरा नींद का क्यूँ दरमियाँ है

सुकूत-ए-मर्ग तारी हर शजर पर
ये कैसा मौसम-ए-तेग़-ओ-सिनाँ है

चमन अफ़्सुर्दा गुल मुरझा गए हैं
ख़िज़ाँ की ज़द पे सारा गुल्सिताँ है

भुला दी आप ने भी वो कहानी
मोहब्बत जिस के दम से जावेदाँ है