वही दर्द-ए-मुसलसल वही सर्फ़-ए-दुआ मैं
बसर होती हुई शब बसर होता हुआ मैं
अकेला अपना महरम कि अपना दूसरा मैं
नज़र में आइना मैं समाअ'त में सदाएँ
मियान-ए-महशरिस्ताँ अजब बे-वासता मैं
नहीं उस की ख़बर मैं नहीं अपना पता मैं
मैं आसाँ भी कठिन भी मगर तुम कौन मेरे
मैं आप अपना तज़ब्ज़ुब ख़ुद अपना फ़ैसला मैं
सुकून-ए-ना-आश्ना लोग ये आपस में जुदा लोग
बहुत कुछ देखता हूँ सर-ए-राहे खड़ा मैं
मैं क्या हूँ किस जगह हूँ कहो वाबस्तगाँ कुछ
न मिट्टी की महक मैं न पर्बत की हवा मैं
तुम्हें जब लौटना हो ख़ुशी से लौट आना
वफ़ा क़ाएम मिलूँगा यही मैं तय-शुदा मैं
ग़ज़ल
वही दर्द-ए-मुसलसल वही सर्फ़-ए-दुआ मैं
राजेन्द्र मनचंदा बानी

