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वफ़ा के ज़ख़्म हम धोने न पाए | शाही शायरी
wafa ke zaKHm hum dhone na pae

ग़ज़ल

वफ़ा के ज़ख़्म हम धोने न पाए

बाक़ी सिद्दीक़ी

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वफ़ा के ज़ख़्म हम धोने न पाए
बहुत रोए मगर रोने न पाए

कुछ इतना शोर था शहर-ए-सबा में
मुसाफ़िर रात-भर सोने न पाए

जहाँ थी हादिसा हर बात 'बाक़ी'
वहीं कुछ हादसे होने न पाए