वाँ से घर आ के कहाँ सोना था
सुब्ह तक याद थी और रोना था
जब हुई सुब्ह तो बिस्तर से फिर उठ
गिर्या-ए-ख़ूनी से मुँह धोना था
धो चुके मुँह को तो किश्त-ए-दिल में
तुख़्म ग़म का हमें फिर बौना था
बो चुके तुख़्म तो पाया ये समर
कि जिगर-कावी थी जी खोना था
जी के खोने के हो दरपय ये कहा
कि नसीबों में यही होना था
होना क़िस्मत का कहें क्या ता-शाम
हम थे और घर का बस इक कोना था
कोने लग बैठे तो 'जुरअत' ऐ वाए!
फिर वही रात थी और रोना था
ग़ज़ल
वाँ से घर आ के कहाँ सोना था
जुरअत क़लंदर बख़्श

