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वाँ से घर आ के कहाँ सोना था | शाही शायरी
wan se ghar aa ke kahan sona tha

ग़ज़ल

वाँ से घर आ के कहाँ सोना था

जुरअत क़लंदर बख़्श

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वाँ से घर आ के कहाँ सोना था
सुब्ह तक याद थी और रोना था

जब हुई सुब्ह तो बिस्तर से फिर उठ
गिर्या-ए-ख़ूनी से मुँह धोना था

धो चुके मुँह को तो किश्त-ए-दिल में
तुख़्म ग़म का हमें फिर बौना था

बो चुके तुख़्म तो पाया ये समर
कि जिगर-कावी थी जी खोना था

जी के खोने के हो दरपय ये कहा
कि नसीबों में यही होना था

होना क़िस्मत का कहें क्या ता-शाम
हम थे और घर का बस इक कोना था

कोने लग बैठे तो 'जुरअत' ऐ वाए!
फिर वही रात थी और रोना था