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वाहिमे की ये मश्क़-ए-पैहम क्या | शाही शायरी
wahime ki ye mashq-e-paiham kya

ग़ज़ल

वाहिमे की ये मश्क़-ए-पैहम क्या

फ़ानी बदायुनी

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वाहिमे की ये मश्क़-ए-पैहम क्या
यास ओ उम्मीद शादी ओ ग़म क्या

तुम को इस राज़-ए-मा-सिवा की क़सम
तुम पे छाया हुआ है आलम क्या

उन के आगे ग़म इक फ़साना है
उन से कहिए फ़साना-ए-ग़म क्या

ऐश-ए-रफ़्ता की याद से हासिल
क़िस्सा-ए-ख़ुल्द ओ ज़िक्र-ए-आदम क्या

ता-कुजा आह-ए-ज़ेर-ए-लब आख़िर
इंतिहा-ए-सुकूत बरहम क्या

ग़म-ए-दुनिया ब-क़द्र-ए-ज़र्फ़ नहीं
हसरत-ए-बेश ओ शिकवा-ए-कम क्या

सोज़-ए-ग़म की हदें नहीं मिलतीं
बुझ गई आतिश-ए-जहन्नम क्या

गर्म-ओ-सर्द-ए-ज़माना जो कुछ हो
वर्ना फ़िरदौस क्या जहन्नम क्या

मौत जिस की हयात हो 'फ़ानी'
उस शहीद-ए-सितम का मातम क्या