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वाए-तक़दीर क्या ये अलमिया नहीं | शाही शायरी
wae-taqdir kya ye alamiya nahin

ग़ज़ल

वाए-तक़दीर क्या ये अलमिया नहीं

अतहर शकील

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वाए-तक़दीर क्या ये अलमिया नहीं
सब हैं अपने मगर कोई अपना नहीं

दीदा-ओ-दिल कि सुनसान सहरा हुए
दिल में जज़्बा तो आँखों में सपना नहीं

इश्क़ को तर्क करने में दिक़्क़त न थी
इश्क़ को मश्ग़ला हम ने समझा नहीं

अब के मुझ से मिला वो तो ऐसा लगा
वो ही चेहरा है लेकिन वो चेहरा नहीं

फुंक रहा है बदन कुंज-ए-तन्हाई में
सर पे छत है मगर माँ का साया नहीं

मेरी नज़रों में दुनिया भी उक़्बा भी है
आदमी हूँ मैं 'अतहर' फ़रिश्ता नहीं