वाए-तक़दीर क्या ये अलमिया नहीं
सब हैं अपने मगर कोई अपना नहीं
दीदा-ओ-दिल कि सुनसान सहरा हुए
दिल में जज़्बा तो आँखों में सपना नहीं
इश्क़ को तर्क करने में दिक़्क़त न थी
इश्क़ को मश्ग़ला हम ने समझा नहीं
अब के मुझ से मिला वो तो ऐसा लगा
वो ही चेहरा है लेकिन वो चेहरा नहीं
फुंक रहा है बदन कुंज-ए-तन्हाई में
सर पे छत है मगर माँ का साया नहीं
मेरी नज़रों में दुनिया भी उक़्बा भी है
आदमी हूँ मैं 'अतहर' फ़रिश्ता नहीं
ग़ज़ल
वाए-तक़दीर क्या ये अलमिया नहीं
अतहर शकील

