उठ गए याँ से अपने हमदम तो
हाथ मलते ही रह गए हम तो
यार आया है देख लूँ इस को
ऐ अजल दम ले तू कोई दम तो
मूनिस-ए-ताज़ा हैं ये दर्द-ओ-अलम
मुद्दतों का रफ़ीक़ है ग़म तो
अपना आशिक़ न जान तू मुझ को
इस को जाने है एक आलम तो
बे-हलावत नहीं ख़त-ए-लब-ए-यार
फ़िल-हक़ीक़त शकर है ये सम तो
दिल भी बह जाएगा तिरे हम-राह
कारवान-ए-सरिश्क टुक थम तो
क्यूँ रखूँ दाग़ दिल पर ऐ 'जोशिश'
दाग़ को बह करे है मरहम तो
ग़ज़ल
उठ गए याँ से अपने हमदम तो
जोशिश अज़ीमाबादी

