उश्शाक़ में नाम हो चुका है
'कैफ़ी' बदनाम हो चुका है
क्या पूछते हो मरीज़-ए-ग़म को
काम उस का तमाम हो चुका है
आशिक़ का न इम्तिहाँ लो वो तो
बंदा-ए-बे-दाम हो चुका है
क्यूँ हम से न मुँह छुपा के जाएँ
हाँ आप का काम हो चुका है
क्या काम हमें रहा किसी से
जब अपना ही काम हो चुका है
'कैफ़ी' कब तक ये ख़्वाब-ए-ग़फ़लत
मेहर लब-ए-बाम हो चुका है
ग़ज़ल
उश्शाक़ में नाम हो चुका है
दत्तात्रिया कैफ़ी

