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उसे शिकस्त न होने पे मान कितना था | शाही शायरी
use shikast na hone pe man kitna tha

ग़ज़ल

उसे शिकस्त न होने पे मान कितना था

हसन अकबर कमाल

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उसे शिकस्त न होने पे मान कितना था
जो रेज़ा रेज़ा हुआ सख़्त-जान कितना था

है अब दिलों में ये दहशत कि सर पे आ न गिरे
ज़मीं से दूर यही आसमान कितना था

मैं अपना ज़र्फ़ भी देखूँ कि उस से रंजिश पर
भुला दिया कि वही मेहरबान कितना था

बजा है वुसअत-ए-दुनिया मगर छुटा जब घर
खुला कि तंग हमीं पर जहान कितना था

दिए तो बुझ गए बिजली के क़ुमक़ुमे न बुझे
हवा को ज़ोर पे अपने गुमान कितना था

जो फूल गोद से उस की 'कमाल' छीने गए
उदास उन के लिए फूल-दान कितना था