उसे इक अजनबी खिड़की से झाँका
ज़माने को नई खिड़की से झाँका
वो पूरा चाँद था लेकिन हमेशा
गली में अध-खुली खिड़की से झाँका
में पहली मर्तबा नश्शे में आया
कोई जब दूसरी खिड़की से झाँका
अमर होने की ख़्वाहिश मर गई थी
जब इस ने दाइमी खिड़की से झाँका
में सब्ज़े पर चला था नंगे पाँव
सहर दम शबनमी खिड़की से झाँका
मुझे भाते हैं लम्हे इख़तितामी
में पहले आख़िरी खिड़की से झाँका
ग़ज़ल
उसे इक अजनबी खिड़की से झाँका
अहमद ख़याल

