उस से बिछड़ के बाब-ए-हुनर बंद कर दिया
हम जिस में जी रहे थे वो घर बंद कर दिया
शायद ख़बर नहीं है ग़ज़ालान-ए-शहर को
अब हम ने जंगलों का सफ़र बंद कर दिया
अपने लहू के शोर से तंग आ चुका हूँ मैं
किस ने इसे बदन में नज़र-बंद कर दिया
अब ढूँड और क़द्र-शनासान-ए-रंग-ओ-बू
हम ने ये काम ऐ गुल-ए-तर बंद कर दिया
इक इस्म-ए-जाँ पे डाल के ख़ाक-ए-फ़रामुशी
अंधे सदफ़ में हम ने गुहर बंद कर दिया
ग़ज़ल
उस से बिछड़ के बाब-ए-हुनर बंद कर दिया
इरफ़ान सिद्दीक़ी

