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उस से बढ़ कर तो कोई बे-सर-ओ-सामाँ न मिला | शाही शायरी
us se baDh kar to koi be-sar-o-saman na mila

ग़ज़ल

उस से बढ़ कर तो कोई बे-सर-ओ-सामाँ न मिला

रविश सिद्दीक़ी

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उस से बढ़ कर तो कोई बे-सर-ओ-सामाँ न मिला
दिल मिला जिस को मगर दर्द-ए-ग़रीबाँ न मिला

इक ज़रा ज़ौक़-ए-तजस्सुस में बढ़ाया था क़दम
निकहत-ए-गुल को फिर आग़ोश-ए-गुलिस्ताँ न मिला

बात इतनी सी है ऐ वाइ'ज़-ए-अफ़्लाक-नशीं
क्या मिलेगा उसे यज़्दाँ जिसे इंसाँ न मिला

उन से अब तज़्किरा-ए-दौलत-ए-कौनैन है क्यूँ
जिन ग़रीबों को तिरा गोशा-ए-दामाँ न मिला

ख़ूबी-ए-दौलत-ओ-दानिश पे नज़र है सब की
कोई उस दौर में दिल-दादा-ए-इंसाँ न मिला