उस ने बे-कार ये बहरूप बनाया हुआ है
हम ने जादू का इक आईना लगाया हुआ है
दो जगह रहते हैं हम एक तो ये शहर-ए-मलाल
एक वो शहर जो ख़्वाबों में बसाया हुआ है
रात और इतनी मुसलसल किसी दीवाने ने
सुब्ह रोकी हुई है चाँद चुराया हुआ है
इश्क़ से भी किसी दिन म'अरका फ़ैसल हो जाए
उस ने मुद्दत से बहुत हश्र बपाया हुआ है
लग़्ज़िशें कौन सँभाले कि मोहब्बत में यहाँ
हम ने पहले भी बहुत बोझ उठाया हुआ है
बानू-ए-शहर हमें तुझ से नदामत है बहुत
एक दिल है जो किसी और पे आया हुआ है
ग़ज़ल
उस ने बे-कार ये बहरूप बनाया हुआ है
इरफ़ान सिद्दीक़ी

