उस को तुम मेरे तअ'ल्लुक़ का हवाला देते
मैं भी कल उस का शनासा था ये समझा देते
ये अमावस का अँधेरा है कि छुटता ही नहीं
काश वो आ के कभी घर को उजाला देते
हम ने दुनिया का बहुत साथ दिया है अब तक
काश इक बार कभी साथ हम अपना देते
हम तही-दस्त सही फिर भी सख़ी हैं इतने
क़तरा मिलता तो एवज़ में तुम्हें दरिया देते
दिल-शिकस्ता की तसल्ली को है दुनिया लेकिन
काश वो भी तो कभी आ के सहारा देते
सिर्फ़ ग़फ़लत को तो सोना नहीं कहते 'अतहर'
आँखों को नींद ही के साथ में सपना देते
ग़ज़ल
उस को तुम मेरे तअ'ल्लुक़ का हवाला देते
अतहर शकील

