उस को ग़फ़लत-पेशा कह आते हैं हम
भूल जाना याद दिल्वाते हैं हम
ज़ोफ़ से रहता है अब पाँव पे सर
आप अपनी ठोकरें खाते हैं हम
दिल नहीं उस बुत की उल्फ़त छोड़ता
ना-समझ को लाख समझाते हैं हम
है जनाज़ा इस लिए भारी मिरा
हसरतें दिल की लिए जाते हैं हम
बार-ए-इस्याँ सर पे है गोया बहुत
क्या उठाएँ सर झुके जाते हैं हम
ग़ज़ल
उस को ग़फ़लत-पेशा कह आते हैं हम
गोया फ़क़ीर मोहम्मद

