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उस की जानिब देखते थे और सब ख़ामोश थे | शाही शायरी
uski jaanib dekhte the aur sab KHamosh the

ग़ज़ल

उस की जानिब देखते थे और सब ख़ामोश थे

सुलतान रशक

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उस की जानिब देखते थे और सब ख़ामोश थे
उस की आँखें बोलती थीं और लब ख़ामोश थे

यूँ तो दिल वाले थे महफ़िल थी मगर आलम था ये
उस का जादू था जो हैरत के सबब ख़ामोश थे

चाँद इक नज़दीक से देखा था जब समरान में
हम भी कुछ कहते पर अपने चश्म-ओ-लब ख़ामोश थे

इक सुकूत-ए-मर्ग तारी था चमन-ज़ादों के बीच
महव-ए-ख़्वाब-ए-ख़ुश-दिली थे मिस्ल-ए-शब ख़ामोश थे

सब के चेहरों पर लिखी थीं ख़्वाहिशें 'सुल्तान-रश्क'
यूँ तो लब-बस्ता थे सारे बा-अदब ख़ामोश थे