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उस बात का कोई रंज नहीं हम उस की तवज्जोह पा न सके | शाही शायरी
us baat ka koi ranj nahin hum uski tawajjoh pa na sake

ग़ज़ल

उस बात का कोई रंज नहीं हम उस की तवज्जोह पा न सके

फ़रहत शहज़ाद

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उस बात का कोई रंज नहीं हम उस की तवज्जोह पा न सके
अफ़्सोस हमें बस इतना है हम दिल का हाल छुपा न सके

वो इतना अच्छा है उस को हर कोई अपना कहता है
पर हम क्यूँ अपना समझे थे ये बात उसे समझा न सके

हम आज से पहले ज़ख़्मों पर हँसती आँखों से रोते थे
इस बार मगर दुख ऐसा है हँसना तो जुदा मुस्का न सके

दो लफ़्ज़ बयाँ कर देते हैं इक उम्र का अपनी अफ़्साना
वो छोड़ के गुलशन आ न सका हम छोड़ के सहरा जा न सके

दिल इक ज़िद्दी बच्चे की तरह 'शहज़ाद' से बिगड़ा बैठा है
जुज़ इक नाराज़ से पत्थर के कोई और उसे बहला न सके