उस बात का कोई रंज नहीं हम उस की तवज्जोह पा न सके
अफ़्सोस हमें बस इतना है हम दिल का हाल छुपा न सके
वो इतना अच्छा है उस को हर कोई अपना कहता है
पर हम क्यूँ अपना समझे थे ये बात उसे समझा न सके
हम आज से पहले ज़ख़्मों पर हँसती आँखों से रोते थे
इस बार मगर दुख ऐसा है हँसना तो जुदा मुस्का न सके
दो लफ़्ज़ बयाँ कर देते हैं इक उम्र का अपनी अफ़्साना
वो छोड़ के गुलशन आ न सका हम छोड़ के सहरा जा न सके
दिल इक ज़िद्दी बच्चे की तरह 'शहज़ाद' से बिगड़ा बैठा है
जुज़ इक नाराज़ से पत्थर के कोई और उसे बहला न सके
ग़ज़ल
उस बात का कोई रंज नहीं हम उस की तवज्जोह पा न सके
फ़रहत शहज़ाद

