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उन आँखों से पहले भी कहीं बात हुई है | शाही शायरी
un aankhon se pahle bhi kahin baat hui hai

ग़ज़ल

उन आँखों से पहले भी कहीं बात हुई है

रईस अख़तर

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उन आँखों से पहले भी कहीं बात हुई है
सोचूँगा कहाँ तुम से मुलाक़ात हुई है

तक़्दीस-ए-मोहब्बत पे कहीं हर्फ़ न आए
तस्कीन-ए-हवस शामिल-ए-जज़्बात हुई है

ये रौशनी शाइस्ता उजालों का है धोका
ऐ दोस्त अभी ख़त्म कहाँ रात हुई है

हालात ही ऐसे हैं कि थमते नहीं आँसू
अब ज़िंदगी बे-वक़्त की बरसात हुई है

जिस रोज़ से हम शहर-ए-तमन्ना में लुटे हैं
अफ़्सुर्दगी हम-शक्ल-ए-मुनाजात हुई है

तुम भी तो 'रईस' आज नए ज़ेहन से सोचो
अब तक तो ग़ज़ल नज़्र-ए-रिवायात हुई है