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उम्र गुज़री रहगुज़र के आस-पास | शाही शायरी
umr guzri rahguzar ke aas-pas

ग़ज़ल

उम्र गुज़री रहगुज़र के आस-पास

रसा चुग़ताई

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उम्र गुज़री रहगुज़र के आस-पास
रक़्स करते उस नज़र के आस-पास

ज़ुल्फ़ खुलती है तो उठता है धुआँ
आबशार-ए-चश्म-ए-तर के आस-पास

कौंदती हैं बिजलियाँ बरसात में
ताइर-ए-बे-बाल-ओ-पर के आस-पास

रात भर आवारा पत्ते और हवा
रक़्स करते हैं शजर के आस-पास

छोड़ आया हूँ मता-ए-जाँ कहीं
ग़ालिबन उस रहगुज़र के आस-पास

बाल बिखराए ये बूढ़ी चाँदनी
ढूँडती है क्या खंडर के आस-पास

इस गली में एक लड़का आज भी
घूमता रहता है घर के आस-पास

एक सूरत-आश्ना साए की धूप
पड़ रही है बाम-ओ-दर के आस-पास

कैसे पुर-असरार चेहरे हैं 'रसा'
ख़्वाब-गाह-ए-शीशा-गर के आस-पास