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उम्र बाक़ी राह-ए-जानाँ में बसर होने को है | शाही शायरी
umr baqi rah-e-jaanan mein basar hone ko hai

ग़ज़ल

उम्र बाक़ी राह-ए-जानाँ में बसर होने को है

मुनीर शिकोहाबादी

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उम्र बाक़ी राह-ए-जानाँ में बसर होने को है
आज अपनी सख़्त-जानी संग-ए-दर होने को है

आलम-ए-पीरी में है दाग़-ए-जवानी का फ़रोग़
ये चराग़-ए-शाम ख़ुर्शीद-ए-सहर होने को है

आमद-ए-पीरी में ग़फ़लत है जवानी की वही
नींद से आँखें नहीं खुलतीं सहर होने को है

हम को रुस्वा कर के रुस्वाई से बचना है मुहाल
तू भी तश्हीर ऐ निगाह-ए-फ़ित्ना-गर होने को है

दाग़-ए-इस्याँ इक तरफ़ अश्क-ए-नदामत इक तरफ़
नूह के तूफ़ान से जंग-ए-शरर होने को है

कौन सी धुन हो गई देखें दिल-ए-सद-पाश को
ये शिकस्ता साज़ किस नग़मे का घर होने को है

ख़ल्वत ओ कसरत में मुझ से पूछती है बेकसी
उस तरफ़ हो जाऊँ मैं भी तू जिधर होने को है

यूसुफ़-ए-मज़मूँ को लाए फ़िक्र-ए-कुहना ऐ 'मुनीर'
ये ज़ुलेख़ा नौजवाँ बार-ए-दिगर होने को है