उल्फ़त के इम्तिहाँ में अग़्यार फ़ेल निकले
थे पास एक हम ही जो जाँ पे खेल निकले
तेग़-ओ-सिनाँ को रख दो आँखें लड़ाओ हम से
अच्छी है वो लड़ाई जिस में कि मेल निकले
देखा जो नूर उस का तो खुल गई हैं आँखें
दुनिया-ओ-दीं के झगड़े बच्चों का खेल निकले
उम्मीद नेकियों की रक्खो न तुम बुरों से
मुमकिन नहीं खली से हरगिज़ जो तेल निकले
कब कोहकन से उट्ठा कोह-ए-गिराँ से उल्फ़त
इन सख़्तियों को 'कैफ़ी' कुछ हम ही झेल निकले
ग़ज़ल
उल्फ़त के इम्तिहाँ में अग़्यार फ़ेल निकले
दत्तात्रिया कैफ़ी

