उलट गया है हर इक सिलसिला निशाने पर
चराग़ घात में हैं और हवा निशाने पर
ग़ज़ल में उस को सितम-गर कहा तो रूठ गया
चलो ये हर्फ़-ए-मलामत लगा निशाने पर
मैं अपने सीने से शर्मिंदा होने वाला था
कि आ लगा कोई तीर-ए-जफ़ा निशाने पर
ख़ुदा से आख़िरी रिश्ता भी कट न जाए कहीं
कि अब के है मिरा दस्त-ए-दुआ निशाने पर
वो शोला अपनी ही तेज़ी में जल बुझा वर्ना
रखा था ख़ेमा-ए-सब्र-ओ-रज़ा निशाने पर
मैं इंतिज़ार में हूँ कौन उसे शिकार करे
बहुत दिनों से है मेरी नवा निशाने पर
ग़ज़ल
उलट गया है हर इक सिलसिला निशाने पर
इरफ़ान सिद्दीक़ी

