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उजाला कैसा उजाले का ख़्वाब ला न सके | शाही शायरी
ujala kaisa ujale ka KHwab la na sake

ग़ज़ल

उजाला कैसा उजाले का ख़्वाब ला न सके

एज़ाज़ अफ़ज़ल

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उजाला कैसा उजाले का ख़्वाब ला न सके
सहर से माँग के हम आफ़्ताब ला न सके

हम अपने चेहरा-ए-बे-दाग़ के लिए ऐ अक़्ल
तिरी दुकान से कोई नक़ाब ला न सके

जो चाँद पर भी गए हम तो ख़ाक ही लाए
ज़मीं की नज़्र को इक आफ़्ताब ला न सके

गए तो थे तिरे जल्वों को जाँचने लेकिन
बचा के हम नज़र-ए-इंतिख़ाब ला न सके

ज़मीं की बात ज़मीं की ज़बाँ में कहना थी
हम आसमान से कोई किताब ला न सके