उदास रात का दुख जानता कोई भी न था
मिरी तरह उसे पहचानता कोई भी न था
सब अपने क़द को सनोबर समझ रहे थे वहाँ
मिरे वजूद को गर्दानता कोई भी न था
वो जिस की लाश सड़क पर पड़ी हुई थी कल
उस एक शख़्स को पहचानता कोई भी न था
सब अपनी धुन में मगन अपनी फ़िक्र में गुम थे
नसीहतों को मिरी मानता कोई भी न था
मैं अजनबी था वहाँ सब के वास्ते 'असअद'
तिरे नगर में मुझे जानता कोई भी न था
ग़ज़ल
उदास रात का दुख जानता कोई भी न था
असअ'द बदायुनी

