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उभरी न कोई शक्ल न पैकर नज़र आया | शाही शायरी
ubhri na koi shakl na paikar nazar aaya

ग़ज़ल

उभरी न कोई शक्ल न पैकर नज़र आया

ख़ालिद अहमद

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उभरी न कोई शक्ल न पैकर नज़र आया
तस्वीर में रंगों का समुंदर नज़र आया

ऐ दोस्त तिरा शहर भी है शहर-ए-तिलिस्मात
छूकर जिसे देखा वही पत्थर नज़र आया

हर शख़्स हक़ाएक़ की कड़ी धूप के डर से
ताने हुए औहाम की चादर नज़र आया

हर शख़्स नया शख़्स था जब ग़ौर से देखा
इंसान इक इंसान के अंदर नज़र आया

मैं ख़्वाब में कल रात जिसे चूम रहा था
जागा तो उसी हाथ में पत्थर नज़र आया

जब बोने लगा बीज ख़यालात के 'ख़ालिद'
हर लफ़्ज़ का दामन मुझे बंजर नज़र आया