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तूफ़ाँ नहीं गुज़रे कि बयाबाँ नहीं गुज़रे | शाही शायरी
tufan nahin guzre ki bayaban nahin guzre

ग़ज़ल

तूफ़ाँ नहीं गुज़रे कि बयाबाँ नहीं गुज़रे

सय्यद ज़मीर जाफ़री

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तूफ़ाँ नहीं गुज़रे कि बयाबाँ नहीं गुज़रे
हम मरहला-ए-ज़ीस्त से आसाँ नहीं गुज़रे

कुछ ऐसे मक़ामात भी थे राह-ए-वफ़ा में
महसूस ये होता था कि इंसाँ नहीं गुज़रे

अर्सा हुआ वो ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ नहीं देखी
मुद्दत हुई नज़रों से गुलिस्ताँ नहीं गुज़रे

हर हादिसा-ए-नौ से उलझते गए हर गाम
हम रहगुज़र-ए-शौक़ से गुज़राँ नहीं गुज़रे

हैरान तो गुज़रे हैं ज़माने की रविश से
ये अपनी रविश थी कि परेशाँ नहीं गुज़रे

क्या हम को सताएगा ग़म-ए-गर्दिश-ए-दौराँ
हम तुझ से अभी ऐ ग़म-ए-जानाँ नहीं गुज़रे