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तू ने जो कुछ कि किया मेरे दिल-ए-ज़ार के साथ | शाही शायरी
tu ne jo kuchh ki kiya mere dil-e-zar ke sath

ग़ज़ल

तू ने जो कुछ कि किया मेरे दिल-ए-ज़ार के साथ

मीर मोहम्मदी बेदार

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तू ने जो कुछ कि किया मेरे दिल-ए-ज़ार के साथ
आग ने भी न किया वो तो ख़स-ओ-ख़ार के साथ

आँख उठा कर भी न देखा कभी तू ने ज़ालिम
सर पटक मर गए लाखों तिरी दीवार के साथ

ये कई तार हैं वो रिश्ता-ए-जाँ है यकसर
ग़लत उस ज़ुल्फ़ की तश्बीह है ज़ुन्नार के साथ

रात दिन रहती है जूँ दीदा-ए-तस्वीर खुली
आँख जब से लगी उस आइना-रुख़्सार के साथ

देखियो गिर न पड़े दीजो उसे ऐ क़ासिद
दिल-ए-बेताब लिपटता है मैं तूमार के साथ

क्या अजब ये है कि वो मुझ से मिला रहता है
गुल को पैवस्तगी लाज़िम है कि हो ख़ार के साथ

है सज़ा-वार अगर ऐसे को दीजे दिल-ओ-दीं
हम भी देखा उसे कल दूर से 'बेदार' के साथ