तू ही अनीस-ए-ग़म रहा नाला-ए-ग़म-गुसार-ए-शब
यास-पसंद जब हुआ बिस्मिल-ए-इंतिज़ार-ए-शब
रंग-ए-शिकस्त क्यूँ न हो हाल-ए-उमीद-वार-ए-शब
तू ही तो इश्वा-गर हुआ बाइ'स-ए-इंतिशार-ए-शब
शौक़-ए-लिक़ा-ए-रू-ए-यार चश्म-बराह-ए-इंतिज़ार
आह-ए-सहर से जा मिला दीदा-ए-अश्क-बार-ए-शब
दर्द-ए-शकेब-सोज़ है कर्ब वही हनूज़ है
देख न हो वो बेवफ़ा आज कहीं निसार-ए-शब
लैल-ओ-नहार साज़गार अपने कभी नहीं हुए
देखते काश ऐ निगार वा'दा-ए-उस्तुवार-ए-शब
बहर-ए-ख़ुदा कभी तो कर शाद शहीद-ए-शौक़ को
रोज़-ए-सईद है वही यार जो तू हो यार-ए-शब
वक़्फ़ा-ए-उम्र एक दम हैफ़ है वो भी सर्फ़-ए-ग़म
किस को है ए'तिमाद-ए-रोज़ किस को है ए'तिबार-ए-शब
दिन को ख़याल वस्ल का रात को दर्द-ए-हिज्र है
शग़्ल वो रोज़ का हुआ और ये कारोबार-ए-शब
ये शब-ए-माहताब है साफ़ हमें जवाब है
माह-लक़ा हैं मुंतज़िर मिल के दिखा बहार-ए-शब
हसरत-ए-इश्तियाक़ ने आज किया शहीद-ए-हिज्र
मेरे दिल-निगार का देख तो ले मज़ार-ए-शब
बाब-ए-क़ुबूल-ए-मुद्दआ' दाई-ए-ख़ैर है तिरा
हो दिल-ए-शब में नाला-कश ऐ दिल-ए-बेक़रार-ए-शब
अब नहीं वक़्फ़-ए-इंतिज़ार रात को मिल गया निगार
मेरा करीम-ए-कार-साज़ हो गया पर्दा-दार-ए-शब
दम-कश-ए-ऐश-ओ-ख़ुर्रमी था ये फ़िराक़-ए-सीना-सोज़
दौर-ए-नशात हो गया शुक्र है हम-कनार-ए-शब
बा'द-ए-फ़िराक़ रंग-ए-वस्ल होता है ऐन इम्बिसात
मेरा वो राहत-ए-रवाँ दिल से हुआ दो-चार-ए-शब
इस का शिआ'र क्यूँ न हो पास-ए-हिजाब-ए-आशिक़ाँ
शब है हमारी राज़दाँ हम जो हैं राज़दार-ए-शब
छुप न सका हिजाब में इश्वा-ए-हुस्न-ए-ख़ुद-नुमा
आया जो माह ओढ़ कर चादर-ए-ज़र-निगार-ए-शब
जाम शराब-ए-शौक़ का देता है शोख़ माह-रू
मस्त-ए-सुरूर क्यूँ न हों 'साक़ी' मय-गुसार-ए-शब
ग़ज़ल
तू ही अनीस-ए-ग़म रहा नाला-ए-ग़म-गुसार-ए-शब
पंडित जवाहर नाथ साक़ी

