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तू है गर मुझ से ख़फ़ा ख़ुद से ख़फ़ा हूँ मैं भी | शाही शायरी
tu hai gar mujhse KHafa KHud se KHafa hun main bhi

ग़ज़ल

तू है गर मुझ से ख़फ़ा ख़ुद से ख़फ़ा हूँ मैं भी

मज़हर इमाम

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तू है गर मुझ से ख़फ़ा ख़ुद से ख़फ़ा हूँ मैं भी
मुझ को पहचान कि तेरी ही अदा हूँ मैं भी

एक तुझ से ही नहीं फ़स्ल-ए-तमन्ना शादाब
वही मौसम हूँ वही आब-ओ-हवा हूँ मैं भी

मुझ को पाना हो तो हर लम्हा तलब कर न मुझे
रात के पिछले पहर माँग! दुआ हूँ मैं भी

सब्त हूँ दस्त-ए-ख़मोशी पे हिना की सूरत
ना-शुनीदा ही सही तेरा कहा हूँ मैं भी

जाने किस सम्त चलूँ कौन से रुख़ मुड़ जाऊँ
मुझ से मत मिल कि ज़माने की हवा हूँ मैं भी

यूँ न मुरझा कि मुझे ख़ुद पे भरोसा न रहे
पिछले मौसम में तिरे साथ खिला हूँ मैं भी