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तू भी कर ग़ौर इस कहानी पर | शाही शायरी
tu bhi kar ghaur is kahani par

ग़ज़ल

तू भी कर ग़ौर इस कहानी पर

अनवर सदीद

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तू भी कर ग़ौर इस कहानी पर
जो लिखी जा रही है पानी पर

ये ज़मीं ज़र उगाएगी इक दिन
रख यक़ीं अपनी कल्बा-रानी पर

उस की बे-मेहवरी पे ग़ौर न कर
रहम खा उस की बे-ज़बानी पर

गरचे मुश्किल तलाश थी उस की
घर तिरा मिल गया निशानी पर

उन से मअनी कशीद कर अपने
नक़्श उभरे हैं जो भी पानी पर

क़ाएम 'अनवर-सदीद' ने रक्खा
इर्तिकाज़ अपनी ज़िंदगानी पर