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तुर्फ़ा चमन खिला है दिल-ए-दाग़-दार का | शाही शायरी
turfa chaman khila hai dil-e-dagh-dar ka

ग़ज़ल

तुर्फ़ा चमन खिला है दिल-ए-दाग़-दार का

शोला करारवी

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तुर्फ़ा चमन खिला है दिल-ए-दाग़-दार का
या'नी ख़िज़ाँ से काम लिया है बहार का

कट जाए पत्ता कब वरक़-ए-रोज़गार का
क्या ए'तिबार हस्ती-ए-ना-पाएदार का

मदफ़न है इक शहीद-ए-ग़रीब-उद-दयार का
कतबा बता रहा है ये लौह-ए-मज़ार का

पहुँचा सबा के साथ वो कूचे में यार के
देखो तो हौसला मिरे मुश्त-ए-ग़ुबार का

जन्नत का सब्ज़-बाग़ न ज़ाहिद दिखा मुझे
मेरे भी घर में पेड़ लगा है अनार का

बारा-दरी में रहता हूँ 'शो'ला' शरफ़ ये है
अस्ना-अशर हूँ शुक्र है परवरदिगार का