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तुम्हारी बज़्म में मुझ तक भी जाम आया तो | शाही शायरी
tumhaari bazm mein mujh tak bhi jam aaya to

ग़ज़ल

तुम्हारी बज़्म में मुझ तक भी जाम आया तो

रईस नियाज़ी

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तुम्हारी बज़्म में मुझ तक भी जाम आया तो
वुफ़ूर-ए-शौक़ ने कोई मक़ाम पाया तो

क़दम क़दम पे हमारी ही आज़माइश है
अगर तुम्हें किसी मंज़िल पे आज़माया तो

हम अपनी ताब-ए-नज़र से बहुत पशेमाँ हैं
फिर अब की बार हमें कुछ नज़र न आया तो

दिल-ए-तबाह से शायद कोई किरन फूटी
हरीम-ए-शौक़ का हर गोशा जगमगाया तो

तुम्हारे ग़म को मता-ए-हयात समझा हूँ
ब-इत्तिफ़ाक़ ये ग़म भी न रास आया तो

मुझे सताओ बड़े शौक़ से सताओ तुम
मुझे सता के भी तुम ने न चैन पाया तो