तुम ने बीमार-ए-मोहब्बत को अभी क्या देखा
जो ये कहते हुए जाते हो कि देखा देखा
तिफ़्ल-ए-दिल को मिरे क्या जाने लगी किस की नज़र
मैं ने कम्बख़्त को दो दिन भी न अच्छा देखा
ले गया था तरफ़-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ दिल-ए-ज़ार
क्या कहें तुम से जो कुछ वाँ का तमाशा देखा
वो जो थे रौनक़-ए-आबादी-ए-गुलज़ार-ए-जहाँ
सर से पा तक उन्हें ख़ाक-ए-रह-ए-सहरा देखा
कल तलक महफ़िल-ए-इशरत में जो थे सद्र-नशीं
क़ब्र में आज उन्हें बेकस-ओ-तन्हा देखा
बस-कि नैरंगी-ए-आलम पे उसे हैरत थी
आईना ख़ाक-ए-सिकंदर को सरापा देखा
सर-ए-जमशेद के कासे में भरी थी हसरत
यास को मोतकिफ़-ए-तुर्बत-ए-दारा देखा
ग़ज़ल
तुम ने बीमार-ए-मोहब्बत को अभी क्या देखा
अकबर इलाहाबादी

