तुम हो जब मेरे लिए हैं दो-जहाँ मेरे लिए
ये ज़मीं मेरे लिए ये आसमाँ मेरे लिए
इस तरह जज़्बात-ए-आज़ादी बहल जाएँगे क्या
बन रहा है क्यूँ क़फ़स में आशियाँ मेरे लिए
मैं चला जाऊँ न गुलशन छोड़ कर क़ब्ल-अज़-बहार
क्यूँ गिरीं सारे चमन पर बिजलियाँ मेरे लिए
रो रहा हूँ आज मैं सारे जहाँ के वास्ते
रोएगा कल देखना सारा जहाँ मेरे लिए
इज़्तिराब-ए-शौक़ से क्या क्या हुई हैं लग़्ज़िशें
इल्तिफ़ात-ए-यार ने जब इम्तिहाँ मेरे लिए
है मोहब्बत कब रहीन-ए-राह-ओ-रस्म-ए-ताहिरी
बंदगी है बे-नियाज़-ए-आस्ताँ मेरे लिए
बे-पनाही है यही 'बिस्मिल' जो हुस्न-ओ-इश्क़ की
होगी ना-काफ़ी हयात-ए-जाविदाँ मेरे लिए
ग़ज़ल
तुम हो जब मेरे लिए हैं दो-जहाँ मेरे लिए
बिस्मिल सईदी

