तुम अपनी याद से कह दो न जाए छोड़ के दिल
कि दर्द-ए-हिज्र न रख दे कहीं मरोड़ के दिल
अब आप के मिरे घर तक क़दम नहीं आते
ये वो सज़ा है दिया था जो हाथ जोड़ के दिल
ख़ुदा रखे अभी कमसिन हो क़द्र क्या जानो
ज़रा सी देर में रख दोगे तोड़-फोड़ के दिल
लिया था जैसे उसी तरह फेर भी देते
ये क्या कि फेंक दिया तुम ने मुँह सिकोड़ के दिल
हमारे साथ न देखी बहार तारों की
'क़मर' चले गए वो चाँदनी में तोड़ के दिल
ग़ज़ल
तुम अपनी याद से कह दो न जाए छोड़ के दिल
क़मर जलालवी

