EN اردو
तुम ऐ रईस! अब न अगर और मगर करो | शाही शायरी
tum ai rais! ab na agar aur magar karo

ग़ज़ल

तुम ऐ रईस! अब न अगर और मगर करो

रईस अमरोहवी

;

तुम ऐ रईस! अब न अगर और मगर करो
कुछ देर अपने साथ भी प्यारे! बसर करो

मुमकिन है ज़ात का उसी लम्हे में हो ज़ुहूर
इक लम्हा काएनात से क़त-ए-नज़र करो

तय्यारा-हा-ए-अहद-ए-रवाँ हैं सदा-शिगाफ़
मिस्ल-ए-शुआ-ए-नूर ख़ला में सफ़र करो

कब तक मुआमला ये दिमाग़ों से शहद का?
तासीर-ए-ज़हर बन के दिलों में गुज़र करो

कब तक ख़ुद अपने दिल में चुभोओगे बर्छियाँ
नोक-ए-सिनाँ से गुम्बद-ए-बे-दर में दर करो

मिलता नहीं मकाँ जो शरीफ़ों के शहर में
उट्ठो तवाइफ़ों के घराने में घर करो