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तुझे गर पास-ए-ग़ैरत ऐ सितमगर हो नहीं सकता | शाही शायरी
tujhe gar pas-e-ghairat ai sitamgar ho nahin sakta

ग़ज़ल

तुझे गर पास-ए-ग़ैरत ऐ सितमगर हो नहीं सकता

जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर

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तुझे गर पास-ए-ग़ैरत ऐ सितमगर हो नहीं सकता
तो दिल भी शाकी-ए-ताज़ीर-ए-ख़ंजर हो नहीं सकता

मैं तर्क-ए-बादा-नोशी के लिए मुद्दत से कोशाँ हूँ
मगर ये काम पूरा क़ब्ल-ए-महशर हो नहीं सकता

बुला कर बात पूछें रू-ब-रू अपने तो रो देना
दलाएल का असर कुछ इस से बेहतर हो नहीं सकता

शिकायत तुझ से क्या साक़ी कि है ताख़ीर का आदी
सितम दुनिया में लेकिन इस से बढ़ कर हो नहीं सकता

सुकून-ओ-ज़ब्त की तो हम-नशीं मैं इंतिहा कर दूँ
मगर मुझ को वो यूसुफ़ अब मयस्सर हो नहीं सकता

पिलाए जा कि मैं मदहोश हो जाऊँ तो तू माने
कि मय-नोशी में कोई मुझ से बढ़ कर हो नहीं सकता

सुख़न-साज़ी में लाज़िम है कमाल-ए-इल्म-ओ-फ़न होना
महज़ तुक-बंदियों से कोई शाएर हो नहीं सकता

हुनर-मंदों की हर मज्लिस से ये आवाज़ आती है
कि नादाँ का कोई दुनिया में 'रहबर' हो नहीं सकता