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तुझ पे हर हाल में मरना चाहूँ | शाही शायरी
tujh pe har haal mein marna chahun

ग़ज़ल

तुझ पे हर हाल में मरना चाहूँ

रूही कंजाही

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तुझ पे हर हाल में मरना चाहूँ
मैं तो ये काम ही करना चाहूँ

हासिल-ए-ज़ीस्त है जुर्म-ए-उल्फ़त
मर के भी मैं न मुकरना चाहूँ

अपने उस्लूब में चाहूँ जीना
अपने अंदाज़ में मरना चाहूँ

मुतवज्जह करे कोई तो उसे
मिस्ल-ए-गुल मैं भी निखरना चाहूँ

कितना महदूद हुआ जाता हूँ
मैं कि हर हद से गुज़रना चाहूँ

एक जुगनू हूँ मगर देख अंदाज़
सुब्ह की तरह बिखरना चाहूँ

सूरत-ए-नग़्मा-ए-जाँ ऐ 'रूही'
मैं तिरे दिल में उतरना चाहूँ