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तुझ बिन सरिश्क-ए-ख़ूँ का है आँखों से तुग़्याँ इस क़दर | शाही शायरी
tujh bin sarishk-e-KHun ka hai aankhon se tughiyan is qadar

ग़ज़ल

तुझ बिन सरिश्क-ए-ख़ूँ का है आँखों से तुग़्याँ इस क़दर

मीर मोहम्मदी बेदार

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तुझ बिन सरिश्क-ए-ख़ूँ का है आँखों से तुग़्याँ इस क़दर
बरसा नहीं अब तक कहीं अब्र-ए-बहाराँ इस क़दर

गुलशन में गर देखें मुझे हुईं सुम्बुल ओ नर्गिस ख़जिल
दिल है परेशाँ इस क़दर आँखें हैं हैराँ इस क़दर

रखता है तू जिस जा क़दम होता है लोहू का निशाँ
पामाल करता है कोई ख़ून-ए-शहीदाँ इस क़दर

ढूँढे जो तू दामन तलक पावे न साबित तू उसे
मैं चाक फिरता हूँ किए नासेह गरेबाँ इस क़दर

'बेदार' को दिखला के तू ने क़त्ल औरों को किया
करता है ऐ ज़ालिम कोई ज़ुल्म-ए-नुमायाँ इस क़दर