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तोहमत-ए-सैर-ए-चमन हम पे लगी क्या न हुआ | शाही शायरी
tohmat-e-sair-e-chaman hum pe lagi kya na hua

ग़ज़ल

तोहमत-ए-सैर-ए-चमन हम पे लगी क्या न हुआ

फ़ारूक़ नाज़की

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तोहमत-ए-सैर-ए-चमन हम पे लगी क्या न हुआ
तब-ए-आज़ाद में ज़ंजीर पड़ी क्या न हुआ

वो अलम-दोस्त थे हम जिन की हर इक मौसम में
देखते देखते ख़ुशियों से ठनी क्या न हुआ

ख़्वाब तो ख़्वाब रहे नींद भी आने से रही
गर्द-ए-बेदारी-ए-शब मुँह पे मली क्या न हुआ

सीना-ए-बर्ग-ए-गुल-ए-तर पे नज़र थी अपनी
ज़िंदगी आग के साँचे में ढली क्या न हुआ

हम तो क्या चीज़ थे इस शहर के हंगामों में
अहल-ए-दानिश की कहाँ पेश चली क्या न हुआ