तिरा हम ने जिस को तलबगार देखा
उसे अपनी हस्ती से बे-ज़ार देखा
अदा ही की हसरत में सब मर गए सच
तजल्ली को किस ने ब-तकरार देखा
तिरी आँख भर जिस ने तस्वीर देखी
वो तस्वीर सा नक़्श-ए-दीवार देखा
अजब कुछ ज़माने की है रस्म यारो
जो है काम का उस को बेकार देखा
व-लेकिन अचम्भा बड़ा मुझ को ये है
कि टुक 'सोज़' का गर्म बाज़ार देखा
ग़ज़ल
तिरा हम ने जिस को तलबगार देखा
मीर सोज़

