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तीर की परवाज़ है मश्कीज़ा-ए-दिल की तरफ़ | शाही शायरी
tir ki parwaz hai mashkiza-e-dil ki taraf

ग़ज़ल

तीर की परवाज़ है मश्कीज़ा-ए-दिल की तरफ़

काविश बद्री

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तीर की परवाज़ है मश्कीज़ा-ए-दिल की तरफ़
हो के घायल फिर भी हम माइल हैं क़ातिल की तरफ़

गो नहीं पैराक लेकिन हौसला बढ़ने का है
मौज की इक फ़ौज सफ़-बस्ता है साहिल की तरफ़

हर जगह हाज़िर हूँ मैं अपने मिसाली तन के साथ
फ़ासले और वक़्त बे-मा'नी हैं मंज़िल की तरफ़

जैसी अपनी ऐन है उतनी ही अपनी दौड़-धूप
क़ैस महमिल की तरफ़ हम शम-ए-महफ़िल की तरफ़

सौत-ए-नाक़ूस-ओ-जरस हो या अज़ाँ हो या जरस
रास्ता इक और जाता है सलासिल की तरफ़

जैसे बे-हर्फ़-ओ-नवा उतरी है इल्हामी किताब
वो मुख़ातब हैं उसी अंदाज़ से दिल की तरफ़

बादा-ख़्वारों में भी हम 'काविश' वली बन कर जिए
रुख़ हमारा था तसव्वुफ़ के मसाइल की तरफ़